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Thursday, 19 April 2018

                                   ६६,अभिव्यक्ति 





                             ६५ ,मैं और तुम 




                                   ६४,इबादत 
















इबादत ,अक्स यादें ........बेहिसाब ,
तन्हाई का अजीब जमाना है साहब ।
वो जुर्म करके भी आजाद हैं ,
दागदार पर /*****************
ख़्वाब लूटने का इल्जाम है साहब।

                                  ६३,कुछ यूँ ही 

छोड़ दिया सबने अकेला ,
जानते थे मज़बूत है ।
हासिल है प्यार आपका ,
सिर्फ यही मेरा वजूद है ।

हम जिसको प्यार करते हैं 
उसे रुला कैसे सकते हैं ।
दुख में सिर्फ अपनों की याद आती है या
 उनसे भी दूरी बना ली जाती है ।
बहुत असमंजस है ।


प्रेम की भावना एक जीवित व्यक्ति के जीने का संबल बनती है
 और नफरत उसे जीते जी मार देती है ।



                            ६२,राजनीति 

मेरी रचना आज की राजनीति पर ,
आसिफा-या-राजनीति-
hindi.sahityapedia.com

औरत
एक माँ भी है ,एक जननी भी ।
पत्नी भी है , एक बहन भी ।
राजनीति
जिसका न कोई लिंग है ,न धर्म ही ।
जिसका न रूप है ,न व्यक्तिव ही ।
समाज
जो बंट गया है जाति और विवाद में ,
व्यर्थ के अहम और सिर्फ उन्माद में ।
आसिफा
क्या एक लड़की होना ही गुनाह था मेरा
या धर्म को बांटकर फसाद करना लक्ष्य था
अभी तो खेलने की उम्र थी मेरी ,
क्यों हवस से भरी वहशी नजर थी तेरी ।
परी होती हैं बेटियां तुम्हारी ,
फिर क्यों मुझ पर नजर थी तेरी।
क्यों न लाज आयी तनिक भी ,
क्या माँ से बड़ी राजनीति थी तेरी ।
न छोड़ी तुमने मेरी जीने की वजह ,
इंसान नहीं राक्षस जात थी तेरी ।
हवस और दरिंदगी की मैं मिसाल हूँ,
देश की बेटी और जिंदा सवाल हूँ तेरी ।
जीत जाओगे शायद मेरी लाश पर ,
राजनीति की रोटियां सेककर ।
संभल जाओ आज भी ऐ लड़ने वालो
कल की बाजी पर बिछी है बिसात तेरी ।
रूह कांप जाती है आज ये सोचकर ,
पूजते हो जिन मंदिरों में देवी मां को ।
क्यों वही अय्यासी का अड्डा बना दिया ,
दबाकर एक चीख को राख बना दिया।

                           ६१,लेख और कवितायें


जय श्री कृष्णा ,मेरा लेख और 6 कविताएं वार्ष्णेय चेतना ,नोएडा में प्रकाशित ।  

                                           ६०,लेख 




मेरा लेख बदायूं एक्सप्रेस पर 
http://www.badaunexpress


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प्रेम और घृणा के बीच के भाव न जीने देते हैं न आगे बढ़ने देते हैं ।अंतर्मन के भाव जैसे कुछ कहना चाहते हुए भी सिमट जाते हैं । पीड़ा और अहसास के साये जैसे दूर दूर तक हमें अपने पास नहीं आने देते और हमारी रिक्तता हर पल खुद को बोझिल बनाती चली जाती है । हम जिसे अपना समझकर खुश होते हैं वो हमारा होता ही कब है ?कुछ छिपे हुए स्वार्थ ही तो हम सब को एक दूसरे से जोड़े रखते हैं और हम वक्त की धारा में बहते चले जाते हैं । नीरसता ,व्याकुलता ,अकेलापन जब भी छोटे से प्रकाश को देखता है तो लगता है जैसे यही वो किरण है जिसका कब से इंतजार था । भाव , उद्वेग को चीरकर जैसे कालिमा बाहर भागना चाहती है ।हर सुबह सूरज का इंतजार हम सब को जीने की राह दिखाता है लेकिन क्या हम खुले दिल से उस किरण का स्वागत कर पाते हैं ?नहीं कुछ और अच्छा पाने की चाहत में आज की खुशी को भूलकर उस अनजानी खुशी की तलाश में निकल पड़ते हैं जो न कभी किसी ने देखी न महसूस ही की ।कहाँ जा रहे हैं हम ?किसकी तलाश है ?कौन है वो।खुशी ,चलो एक बार फिर से अनजान बनकर बच्चा बन जाते हैं ,शायद वो खुशी मिल जाये ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़