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Wednesday, 13 December 2017

                                             १८० , सम्मान 

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय विजय सिंघल जी जयविजय पत्रिका मुंबई ।

                         १७९,जय श्री कृष्णा 

जीवन में कौन किसको याद रखता है ,
दुनिया सिर्फ मतलब का रिश्ता है ।
दम भरते हैं जो साथ देने का उम्र भर ,
हक़ीक़त में बदले का नाजुक नाता है ।
भूल जाएंगे एक दिन जब सारे रिश्ते ,
कोई भी साथ न निभाएगा ।
सारे रिश्तों से ऊपर एक ही नाता ,
सिर्फ कृष्णा ही साथ आएगा ।

                                 १७८ ,दांपत्य जीवन 

जिम्मेदारियां अपनी जगह हैं और दाम्पत्य जीवन अपनी जगह । सारी जिम्मेदारियों के बीच में आपसी प्यार को बनाये रखना ही जीवन का मूल उद्देश्य होना चाहिए । पैसे कमाने की धुन में इंसान उसी को क्यों भूल जाता है जिस परिवार के लिए वो दिन रात एक करता है । शादी से पहले और शादी के बाद में जीवन इतना क्यों और कैसे बदल जाता है । शायद किसी भी चीज या इंसान की वैल्यू उसके मिलने से पहले ही होती है । जीवन की विषम परिस्थितियों को भी सिर्फ प्यार और विश्वास के सहारे ही जीता जा सकता है ,यही प्रकृति का भी नियम है ।

                                 १७७,कविता 

जय श्री कृष्णा मित्रो ,मेरी एक और कविता मुंबई की मासिक पत्रिका जय विजय के नवम्बर अंक में ,

                                            १७६ शेर 

किसी का दिल दुखाना मेरी आदत नहीं ,
कोई मुझे रुलाये ये सहन होता नहीं ।
सच्चाई के रास्ते पर चलना कठिन है बहुत ,
नफरत समाज से करना मेरी फितरत नहीं ।.

छलक जाती हैं आंखें अक्सर महफ़िल में ,
तन्हाई में सुकून नजर आता है ।
कब तक संभाले कोई दिल को अपने ,
वजूद जब आईना नजर आता है ।


                              १७५ ,जय श्री राम 

जय श्री राम,
जन जन का सिर्फ एक ही नारा शुरू करो मंदिर निर्माण ,
देश मे अपने रहकर भी क्यों भूले अपनी पहचान
बीत गए कितने ही युग अब दिए हुए राम को बनवास 

कैसी निर्दयी न्याय प्रणाली भूल गए खुद की पहचान

राम के आदर्शों पर चलकर कैसे भूले अपनी सभ्यता ,
भारत के ओ वीर सपूतो लहरा दो अब देश की शान ।
मुद्दा राम मंदिर का कैसे बन गया जी का जंजाल ,
देश में अपने रहकर ही कबूल कर लिया गैरों का फरमान
एकता और अखंडता ही है भारत की पहचान ,
कूद पढ़ो अब तुम रण में यही है वक़्त की अजान ।

                            १७४ ,प्रकाशित कविता 

जय श्री कृष्णा मित्रो ,मेरी गजल मुंबई की मासिक पत्रिका जयविजय के दिसम्बर अंक में ,