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Saturday, 10 February 2018

                                      24,दहेज़ 

मेरी रचना 8/2/18 के वर्तमान अंकुर में ,


                                    २३,कवितायेँ 


शुभ प्रभात जय श्री कृष्णा मित्रो आपका दिन शुभ हो ।मेरी रचनाएँ सौरभ दर्शन पाक्षिक पत्र (राजस्थान में )धन्यवाद संपादक मंडल ।


ऋतु बसंत की 
चटक मटक कर गागरिया में नीर भरन को आई वो ,
यूँ सकुचाती ,यूँ लजाती ,अंखियन में लाज भर लाई वो ।

मदमाती ,मतवाली सी चंचल चपल अनौखी छवि की वो ,
अपलक ,रूहानी मुस्कान से खुद को सजा लाई वो।

चंचल चितवन ,नैन घनेरे ,पलकों में सपने भर लाई वो ,
मधुमालती ,गुलाब ,कनेर जैसे आँचल में भर लाई वो ।

एक किरण है ,एक है आशा ,दूजी मुस्कान है मंजिल उसकी ।
अवतार है जैसे रंभा का ,दीप प्रज्वलित कर
लाई वो ।

अगणित ,अंकुर ,अणिमा जैसी प्रीत छलकती मुखमंडल पर ,
वो है मेरी शारदे माँ ,संग अपने एक अजूबा ले आई वो ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़



                                             

"धन्यवाद सौरभ दर्शन ,

उफनते हुए दूध को देखकर जैसे
 विचार भी उबलते लगते हैं ।
डाल देती हूं थोड़ी सी मुस्कान भी
चीनी की तरह जज्बात पिघलने लगते हैं
सोचती हूँ थोड़ा सा हिलाकर तो देखूं बर्तन को ,
कहीं मुस्कराहट वहीं तो नही रह गयी ।
चीनी की मिठास कम हो तो चल जाती है जिंदगी में मिठास कम हो तो अहसास मरने लगते हैं ।
गैस पर रख कर दूध को जाने कहाँ सोच में डूबने लगी ,
मंजिलों को पाने की ख्वाइश जैसे गैस की लौ लगने लगी।
जरा सा तिनका क्या गिरा आंख में,
वो देखो दूध भी बाहर चमकने लगा ,
मंजिल भूलकर जिंदगी देखो,
फिर से रोज की कहानी कहने लगी ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़"
धन्यवाद सौरभ दर्शन ,

उफनते हुए दूध को देखकर जैसे
विचार भी उबलते लगते हैं ।
डाल देती हूं थोड़ी सी मुस्कान भी
चीनी की तरह जज्बात पिघलने लगते हैं
सोचती हूँ थोड़ा सा हिलाकर तो देखूं बर्तन को ,
कहीं मुस्कराहट वहीं तो नही रह गयी ।
चीनी की मिठास कम हो तो चल जाती है जिंदगी में मिठास कम हो तो अहसास मरने लगते हैं ।
गैस पर रख कर दूध को जाने कहाँ सोच में डूबने लगी ,
मंजिलों को पाने की ख्वाइश जैसे गैस की लौ लगने लगी।
जरा सा तिनका क्या गिरा आंख में,
वो देखो दूध भी बाहर चमकने लगा ,
मंजिल भूलकर जिंदगी देखो,
फिर से रोज की कहानी कहने लगी ।

                         २२,हिंदी प्रोत्साहन कार्यक्रम 



जय श्री कृष्णा मित्रो ,कल 2/2/18 को।अलीगढ़ की प्रदर्शनी में हिंदी प्रोत्साहन समिति की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया गया ।जिसमें अलीगढ़ और बाहर के भी कवि और साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया ।देश के जाने माने हास्य व्यंग्य कवि श्री प्रेम किशोर पटाखा सहित डॉ दिनेश शर्मा ,नरेंद्र शर्मा नरेंद्र ,श्री ओम वार्ष्णेय ,पूनम वार्ष्णेय पूनम ,सुभाष तोमर ,वेद प्रकाश मणि ,अनिल नवरंग आदि मौजूद रहे।आपकी मित्र को शहर विधायक आदरणीय संजीव राजा जी के कर कमलों से सम्मान प्राप्त करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ ।

                                      २१,भूख 

जय श्री कृष्णा मित्रो ,जरा इस पर भी विचार करें 
यूँ तो मेरा देश सोने की चिड़िया कहलाता है 
बच्चा मेरे देश का क्यों भूखा ही सो जाता है

लिखकर आता फ़ाइल में अन्न उनके नाम का 
बताओ तो जरा वो ....राशन कहाँ जाता है?
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

                                        २०,सवाल 

Jai shree krishna have a nice day
http://www.badaunexpress.com/badaun-plus/s-534/ ‎
अक्सर छोटे छोटे सवाल हमें बड़ी उलझन में डाल देते हैं ।रोजमर्रा की जिंदगी में काफी सवाल जो मन को विचलित कर जाते हैं ,जैसे कि हम किसी के लिए अपने साइड से कितना भी अच्छा करने की कोशिश करें ,फिर भी बदनामी ही मिलती है ।ये सभी जानते हैं कि हानि लाभ ,यश अपयश ,सब विधि के हाथ है ।यदि सब विधि के ही हाथ है तो फिर जीवन क्या है ?सिर्फ कर्मों का फल ?जो किया है वो जरूर भोगना पड़ेगा ,ये भी सच है ।फिर जिंदगी सिर्फ कर्म पर ही आधारित है ।ईश्वर सब कुछ देखता है ,फिर अन्याय क्यों ?भगवद्गीता ,सारे पुराण भी कर्म को ही महान बताते हैं लेकिन कर्म करने के बाद भी खुशी की प्राप्ति क्यों नहीं ?जितना पढ़ते हैं उतने ही प्रश्न तैयार ।अतीत को भूल जाओ ,आज को याद रखो ।क्या अतीत हमारे वर्तमान को प्रभावित नहीं करता ?ऐसे ही अनगिनत सवाल हैं जो मन को व्यथित कर जाते हैं ।जब हमारे हाथ मे कुछ नहीं होता तो हम सभी अपने मन को यही कहकर समझा लेते हैं जो हुआ अच्छे के लिए हुए ,जो हो रहा है उसमें भी कुछ अच्छाई होगी ।हम सभी इस रंगशाला के पात्र हैं और निर्देशक सिर्फ भगवान । उसके घर देर है अंधेर नहीं ।दुनिया में हम सभी के जीने का सिर्फ एक ही सहारा है और वो है आस्था और विश्वास । चलिए फिर चलते हैं सारे सवालों को छोड़कर उसी आस्था के साथ ,जय श्री कृष्णा जय महाकाल ।☺️
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

                                १९,देश 

वर्तमान अंकुर (नोएडा )29/1/18

                                  १८,जीवन 

ये कैसी फिजा है ।
जल रहा है दिल,
न उठता धुँआ है ।
बेबस है जलजला ,
चुप ये काफिला है ।
आँसूं है गमगीन ,
न लगती दुआ है ।
भरम प्यार का यूँ 
दिल में छिपाए ,
छलते रहे खुद को
मुस्कान के दीप जलाए ।
न कोई सफर है ,
न कोई है साथी ।
अजब है पहेली ,
गजब है ये उलझन।
ये कैसा है जीवन ,
ये कैसा है उपवन ।
सुलग ये रहा है ,
झुलस क्यों रहा है ।
यही है जो जीवन ,
जो कातिल बना है ।
उलझन ही उलझन 
तो क्यों है ये जीवन ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़