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Saturday, 31 December 2016

                              १४०. अलविदा २०१६ 


अलविदा 2016 ,
जा रहा हूँ फिर कभी न आने के लिए ,
आपका 2016 हूँ भुला मत देना मुझे ।
रहेंगी मेरी यादें दिलों में बाकी हमेशा ,
दिया है बहुत कुछ मैंने ज़माने के लिए ।।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

                                        १३९.दिल 

दिल तोड़ने की वजह तो देते हैं दुनिया में बहुत लोग ,
काश शीशे को जोड़ने का हुनर भी सीखा होता किसी
ने !!

Thursday, 29 December 2016

एक अजन्मी बच्ची का दर्द

                                     १३८.नदिया 


बाँध बनाकर प्रेम का ,नदिया सबको....... पिलाय !
प्रेम भरा है दिल में कितना ,वर्षा कैसे वो बतलाय !!










Wednesday, 28 December 2016

                                      137 कौन है दोषी 


जय श्री कृष्णा मित्रो ,मेरी कविता," दैनिक ज्योति नव एक्सप्रेस ",जोधपुर में !


                                             १३६ निर्भया ,


आज हमारे समाज में लड़कियों की कितनी दुर्दशा हो रही है इसके लिए जिम्मेदार कहीं कहीं न कहीं बरसों पुरानी सोच है जो लड़कियों को ऐसा नारकीय जीवन जीने को मजबूर करती है । यू पी में ऐसी ही एक घटना ने हम सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है ।मेरी इसी व्यथा को लेकर एक रचना आज के वागढ दूत में 

                                    १३५.इन्तजार 


मेरी कविता sahitypedia पर ,

                                     १३४.बड़ा दिन 

खुशियों से इतना परहेज क्यों ,
त्यौहार को मिलकर मनाएं ।
भारत है सांस्कृतिक सौहाद्र का प्रतीक ,
हर बात पर इतना विरोध क्यों ???

                                           १३३.मय्यत 

जय श्री कृष्णा ,
मय्यत को भी रुस्बा करने वाले,
कैसे किसी का घर बसायेंगे ।
फूंककर जनाजा अपनों का ही ,
जब खुद तालियां बजायेंगे ।।

                                       १३२.शब्द 


जय श्री कृष्णा मित्रो,
मेरी एक और रचना "सौरभ दर्शन "पाक्षिक पेपर में , ।
शब्द जब प्रत्याशा बन जाते हैं,
टूटे हुए दिलों पर मरहम रखकर ,
जीने की राह दिखा जाते हैं ।
अभिलाषाओं से भरे जीवन में
जब भी पतझड़ आता है ,
राह दिखाने सूनी राहों में ,
प्यार का मधुर अहसास जगा जाते हैं ।
अछूता कौन है जिंदगी की सच्चाई से ,
हर पल जलते हुए शोलों में ,
जैसे ठंढी हवा चला जाते हैं ।
आओ समेट कर सारी इच्छाओं को फिर से कहीं
इनके आँचल तले सो जाते हैं ।।
।।2।।
अल्फाजों को स्वर्ण समझो ,
तारीफ़ को आभूषण ।।
साहित्य है विधा उसकी ,
लेखन जिसका धन ।।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

                                  १३१,कशमकश

कशमकश से भरी जिंदगी कब सुकून देती है ।
चलते तो हैं लोग सभी मंजिलो की तरफ ,
होते हैं कितने खुशनसीब ,मंजिल पनाह देती है ।
गुजर गए वो बीते पल भी खुशियों की चाहत में ,
आज का पल भी गुजर ही जाएगा जिंदगी में ।
चलते रहना ही जिंदगी है ...............दोस्तों ,
जाने क्यों जिंदगी हर कदम इम्तहान लेती है ।।
(17/12/16)mera golden chance miss ho gaya .I am very upset .shayad jo hota hai usmen kuch acchai hi hoti hai .

                                        १३०.रचना 

 मेरी रचना "सौरभ दर्शन "में,


                                                 १२९.नसीब 


जय श्री कृष्णा मित्रो ,
जन्म मृत्यु यश अपयश सब बिधि के हाथ ही तो है ।जो बातें हम अपने लिए सोचते हैं ,वो शायद ही कभी पूरी हो पाती हैं ।इसका मतलब ये तो नहीं कि हम कर्म करना छोड़ दें ।जीवन कब खुद के अनुरूप चलता है ।कभी कभी हालात हमसे वो करा देते हैं ,जिनका ताउम्र अफ़सोस रहता है ।कुछ लोग ऐसे भी होते है जो योग्य होते हुए भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते ।जीवन की विषम परिस्तिथि उनको आगे बढ़ने से रोक देती हैं 
और इंसान खुद को सिर्फ यही कहकर समझा लेता है कि जो हुआ अच्छा ही हुआ ।इंसान के हाथों में कुछ भी तो नहीं ,सिवाय कर्म करने के ।लेकिन जो विपरीत परिस्थितियों में भी समायोजन करके निरंतर प्रयासरत रहते हैं ,वही जीवन में आगे बढ़ पाते हैं ।
"ख्वाइशों की भट्टी में जो उबलता है रात दिन ,
इंसान वही पा लेता है अपनी सुनहरी मंजिल एक दिन ।।"

Wednesday, 14 December 2016

versha varshney {यही है जिंदगी }: १२८.मिठास

versha varshney {यही है जिंदगी }: १२८.मिठास: छू गयी दिल को मेरे तेरी यही दिल लुभाने की अदाएं , कितना नेह है भरा दिल में तेरे , क्या सच में मैं इतनी ही मीठी हूँ , या फिर ये सिर्फ...

१२८.मिठास

छू गयी दिल को मेरे तेरी यही दिल लुभाने की अदाएं ,
कितना नेह है भरा दिल में तेरे ,
क्या सच में मैं इतनी ही मीठी हूँ ,
या फिर ये सिर्फ एक बहम है मीठा सा ।
गर ये सच है तो क्यों दुखाते हो दिल मेरा ।
क्या मेरे दुःख से तुम्हें तनिक भी पीर नहीं होती । हाँ छूना चाहती थी मैं भी आस्मां जैसे दिल को तेरे ,
भागना चाहती थी मैं भी कभी तेरी हंसी के साथ
शायद कुछ तो कमी थी मेरी आराधना में ,
जो अधूरी ही रही मेरी पूजा ।
पत्थर थे तुम ,
पाषाण ही तो थे जो कभी समझ ही न पाए मेरी व्यथाको|
कोई गम नहीं ,ये तो प्रकृति है तुम्हारी ,
कभी तो नम हो ही जाएंगी आँखें तुम्हारी ,
जब अंधेरों में कोई दीप झिलमिलायेगा ।
झलक मेरी पाकर एक बूंद पानी की आँखों से निकल कर जब पूछेगी ,
बताओ न क्या गलती थी मेरी ,
जो फेंक दिया तुमने मुझे बारिश की एक बूंद समझकर|
मैं मात्र एक बूंद ही तो नहीं थी,
'वर्षा 'हूँ आज भी सिर्फ तुम्हारी ।।

                                              १२७.प्रेम

प्रेम सिर्फ.............. प्रेम करना जानता है ,
गलत सही का भेद करना उसे कब आता है ।

१२६.मेरी कुछ अनुभूतियां साहित्यपिडिया पर ,


http://sahityapedia.com/%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE-68419/

हाँ तुमने सच कहा मैं खो गयी हूँ ,
झील की नीरवता में ,जो देखी थी कभी तुम्हारी आँखों में ।
तुम्हारी गुनगुनाहट में ,जो सुनी थी कभी उदासियों में ।
तुम्हें याद हो या न हो मुझे आज भी वो स्वप्न याद है ।
हाँ शायद वो स्वप्न ही तो था ,जो मैंने सच साँझ लिया था ।
खुद को ढूंढने की व्यर्थ एक नाकाम सी कोशिश कर रही हूँ आज भी ।
शायद वो पथरीले रास्ते आज भी मुझे लुभाते हैं ,जिन पर तुम्हारे साथ चलने लगी थी कभी ।
जिंदगी कितनी बेबस हो जाती है कभी कभी ।
हम जानते हैं प्यार मात्र एक छलावा ही तो है ,
फंस जाते हैं फिर भी पार होने की आशा में ।
हाँ सच है खुद को ढो रही हूँ मैं आज भी तुम्हारी ख्वाइशों को तलाशने में ।
क्या कभी तुम मुझे किनारा दे पाओगे ,
क्या कभी जिंदगी को राह मिल पाएगी ?
सुलग रही है एक आशा न जाने क्यों ,
एक कटु सत्य के साथ आज भी ।
हाँ शायद खुद को बहला रही हूँ मैं ,
किसी मीठे भ्रम के साथ ,झूठी आशाओं की गठरी लिए अपने नाजुक कन्धों पर ।
सही कहा तुमने आज भी खुद को सिर्फ छल रही हूँ मैं ,आज भी खुद को छल रही हूँ मैं
किसी स्वप्न के साकार होने की अद्भुत ,अनहोनी पराकाष्ठा की सुखद अनुभूति में ।।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

                                १२५.नींद 

नींद भी हो गई है बिलकुल तुम्हारे जैसी ,
आँखों में रहकर भी दूर रहती है ।।

                                       १२४.नफरत 

नफरतों में ही जीना चाहता है हर इंसान 
क्यूकी प्यार से है वो परेशान 
जीना सिखा है जिसने बस नफरतों में ही 
क्या सिखाएगा किसी को वो हैवान 
जलता है घर किसी का क्यूँ खुश होता है 
आज वो हर इंसान ,
जिसने न सीखा मदद करना कभी किसी की 
वो क्या देगा अपने बच्चों को पैगाम
कर रहे हो आज जो वही तो सीखेगा
कल जो आने वाला  है मेहमान
फिर मत देना दोष कल को
क्यूकि वही तो है तुम्हारा फरमान ||

                                  १२३.आशिकी

क्यों मजबूर होते हैं हम दिल के आगे
क्यों नहीं समझते अपनी सीमाओं को
क्यों चाहता है दिल उड़ना आसमान में पछियों की तरह 
क्यों भागता है मन संसार से 
होते हैं मन में सवाल कई 
फिर भी बस चलते ही रहते हैं 
जिंदगी भर कुछ पाने की तलाश में
जानते हुए भी रहते हैं अनजान इस
तरह जैसे न जानते हों अपनी हक़ीक़त को
यही तो सच है फिर भी चाहता है
दिल शायद कुछ मिल जाए आशिकी में 

                                                 १२१.कला 

जीवन जीने की कला किताबों से नहीं ,सिर्फ अनुभव से ही प्राप्त की जा सकती है ।।


                          १२२.बरगद 
बरगद के पेड़ों तले खुशबू ढूंढने वाले,
अकेले ही रह जाते हैं ।
सफर में जब तक साथ ही न हो रंगीला ,
महक कैसे आएगी सूखे पत्तों से ।

                      १२०.जय श्री कृष्णा ,मेरी रचना सौरभ दर्शन (राजस्थान)में


११८.
साधारण व्यक्ति को समझने के लिए ,
दिमाग की नहीं दिल की जरूरत होती हैं ।
कब समझ पाते हैं लोग ईमानदारी को ,
जिनकी फितरत ही सिर्फ नफरत होती है ।।












११९.
ऐ जिंदगी,
जब भी जीने के लिए वजह ढूँढ़नी चाही ,
तेरा नया फरमान आ गया ।
हम डूबते रहे लहरों के खेल में ,
जब भी किनारा पकड़ना चाहा ।।

                                   ११७.बेटी

विदा हुई जब बेटी अपनी आँखों में आंसूं आ गए ,
लाये थे बनाकर जिसे बहू आँखों में आंसूं भर दिए ।
क्यों बदल गयी वो रीत पुरानी बेटी की शादी पर ,
बहू के अरमानों के जिसने टुकड़े टुकड़े कर दिए ।
बेटी के माँ बाप होना ही गुनाह अनौखा हो गया ,
टुकड़ा दिल का ही चंद मिनटों में पराया हो गया ।
किसने बनायी ये रीत पुरानी ,जहाँ बेटी परायी होती है ,
देखकर समाज के खोखले रिवाज दिल अपना टूट गया ।
कब बदलेगा समाज हमारा कब ???????????????


                                 ११६.उम्मीद 


उम्मीद की चाहत छोड़ दी मैंने ,
जबसे खून का रंग सफेद हो गया ।

Saturday, 19 November 2016

वजूद

११५.
\

भुलाकर खुद का वजूद ,जब भी तुझे भुलाना चाहा ,

तकदीर का फ़साना कहूँ या...... इश्क की ताबीर ,
अश्कों............... में भी तेरा ही अक्स नजर आया !!


Friday, 18 November 2016

                                        ११४.गीत 


मेरे सपनों का सुंदर गीत :
मुझे डर है मेरे प्यार को
खोयी ...मंजिल मिल गयी ।
अरे ऐसी मंजिल मिल गयी
जो मेरे दिल को भिगो गयी ।।
मुझे डर है मेरे प्यार को ...........

                                         ११३.प्यार 


आज का कटु सत्य :
न रहा वो दौर स्नेह का ,न वो अटूट ..बंधन रहा ।
भाई भी आंकने लगा अब प्यार को सामान से,
बहन भी प्यार का हिसाब उपहार से लगाने लगी।
खो गयी वो प्यार मनुहार की रसीली बातें ,
प्यार ,प्यार न होकर सिर्फ एक सौदा बन रहा ।
-----–----------------////////////-----–-----------/
फितरत इंसान की जाने क्या क्या करा देती है ,
बहन को व्यापारी खुद को दुकानदार बना देती है ।

                                          ११२.कविता 


खुले आसमान के नीचे देखकर 
वो चिड़ियों को उड़ते हुए
आते हैं दिन याद बचपन के 
जहाँ थी आजादी उड़ने की 
कुछ बंदिशे थी ज़माने की 
पर खुशियाँ थी चहचहाने  की 

                               १११.दिवाली और पटाखे 

मेरी कविता साहित्यपिडीया पर ,


http://sahityapedia.com/%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A5%87-66114/

दिये की रौशनी में अंधेरों को भागते देखा ,
अपनी खुशियों के लिए बचपन को रुलाते देखा।
दीवाली की खुशियां होती हैं सभी के लिए,
वही कुछ बच्चों को भूख से सिसकते देखा ।
दिए तो जलाये पर आस पास देखना भूल गए ,
चंद सिक्कों के लिए बचपन को भटकते देखा।
क्या होली ,क्या दिवाली माँ बाप के प्यार से महरूम कुछ मासूम को अकेले मे बिलखते
देखा ।
जल रहा था दिल मेरा देखकर जलते हुए पटाखों को ,
लगायी थी कल ही दुत्कार सिर्फ एक रोटी के लिए ,
आज उसी धनवान को नोटों को जलाते देखा ।
मनाकर तो देखो दिवाली को एक नए अंदाज में ,
पाकर कुछ नए उपहार मासूमों को मुस्कराते देखा ।
"दिये तो जलाओ पर इतना याद रहे ,
अँधेरा नहीं जाता सिर्फ दीये जलाने से ।
क्यों न इस दिवाली पर कुछ नया कर जाएँ ,
उठाकर एक अनौखी शपथ ,
न रहे धरा पर कोई भी भूखा हमारे आस पास ,
चलो मिलकर त्यौहार का सही मतलब बता जाएँ ।।"
देखो देखो आयी न चेहरे पर कुछ मुस्कराहट ,
आज सदियों बाद त्यौहार को समझते देखा ।।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

Sunday, 30 October 2016

Happy Diwali

जय गणेश ,जय माँ लक्ष्मी ।
शुभ दीपावली ,आप सभी को दिवाली की अनगिनत शुभकामनाएं ।माँ लक्ष्मी आप सभी को अपार खुशियां दें ।

Thursday, 20 October 2016

११० मेरा वीडियो 





                        



                                     १०९ .करवा चौथ 

आप सभी को करवा चौथ की ढेर सारी शुभकामनाएँ ।कृपया करवा चौथ पर पत्नी का मजाक न बनाएं।
आप सभी के लिए मेरी ओर से कुछ पंक्तियां :

सौंप दिया तुमको जीवन ,
भुलाकर जिसने अपना बजूद ।
गुजार दिया जिसने जीवन ,
खोकर अपनी अभिलाषा ।
कैसे हो सकती है वो नारी
सिर्फ प्रताड़ना की अधिकारी ।
निभाती हर कदम पर साथ तुम्हारा ,
चाहे सुख हो या फिर हो ग़मों की छांव ।
क्या देते उस नारी को तुम बदले में ,
सिर्फ और सिर्फ झूठा और फूहड़ मजाक ।।
नारी ही वो शक्ति है सहकर दुनिया के सारे दुःख,
दुनिया से लड़ जाती है सिर्फ तुम्हारे बजूद के लिए ।
गर पत्नी दुःख का जरिया है ,
तो क्यों वो लड्डू खाते हो ,
रहकर तो देखो तनहा सारी उम्र
क्यों खुद का ही मजाक बनाते हो ।
पति पत्नी हैं गाडी के दो पहिये ,
बिन एक दूसरे के दोनों अधूरे हैं ।
यही है वो अटूट रिश्ता ,
जिसने सृष्टि को जोड़ा है ।

                     १०८,एक पत्नी का पत्र फौजी पति के नाम 


एक पत्नि का अपने फौजी पति के नाम पत्र- ;
छलक जाती हैं मेरी आँखें तुम्हें जाते हुए देखकर ,अब कब आओगे सहम जाती हूँ सिर्फ यही सोचकर |
अगले ही पल खुद को संभाल लेती हूँ मैं ,क्या हुआ गर तुम पास नहीं हो मेरे ,तुम्हारा प्यार तो मेरे पास है|
जरूरी नहीं मेरे पास रहना तुम्हारा ,”भारत माँ”_ को तुम्हारी मुझसे ज्यादा जरूरत है |
क्या हुआ गर बेटा पूछता है मुझसे , माँ पापा कब आयेंगे ?क्या हुआ गर बेटी को तुम्हारी याद सताती है |
सुला देती हूँ अक्सर दोनों को प्यार से लोरी सुनाकर|
माँ भी तुम्हें बहुत याद करती हैं, बाबूजी भी उदास है तुम्हें पास न पाकर |
आ रही है फिर से करवा चौथ और दिवाली ,सहम जाती हूँ फिर से यही सोचकर ,
कैसे सजाऊँगी बिन तुम्हारे जिंदगी के वो पल ,फीके हैं बिन तुम्हारे मेरे श्रृंगार ,
समझा लेती हूँ दिल को फिर यही सोचकर ,क्या हुआ गर तुम इस बार नहीं आओगे ?
कितनी ही माँओं की आस तुम बचाओगे |सिन्दूर बचाओगे कितनी ही बहनों का दुश्मनों से टक्कर लेकर |
“मैं कितनी खुशनसीब हूँ जो पाया तुम्हें जीवन साथी के रूप में |मत होना कभी उदास “ऐ प्यार मेरे “सलाम करती हूँ आज मैं फिर से तुम्हारे जज्बों को ,खुश हूँ मैं बहुत तुम्हें अपनी जिंदगी में पाकर |”
यूँ तो आसान नहीं होता बिन तुम्हारे अकेले रहना ,अगले ही पल तन जाता है गर्व से सर मेरा ,
जब देखती हूँ तुम्हें “भारत माँ_” के लिए अपनी खुशियों की कुर्बानी और सर्वस्व न्यौछावर करते हुए |
हाँ मुझे पूर्ण विश्वास है तुम आओगे जरूर एक दिन हम सबके लिए ढेर सारी खुशियाँ लेकर बहुत सारा प्यार लेकर |
तुम्हारी अर्धांगिनी
जय हिन्द जय भारत
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
संगम बिहार कॉलोनी गली न.३ नगला तिकोना रोड सुरेंद्रनगर अलीगढ़

                                     १०७ बेटियां 


मेरी  रचना"सौरभ दर्शन "राजस्थान में आपके समक्ष समीक्षा के लिए ।

नाजों से पाली बेटियां क्यों हो जाती हैं परायी ,
कहने को लक्ष्मी ,पर लक्ष्मी के लिए हर पल सताई जाती हैं क्यों बेटियां ।
वो गौरी है गर बचपन में ,कब पत्थर बन कर घरों में सज गयी ।
यूँ तो घर की मालकिन ,फिर हर पल क्यों रुलाई जाती हैं बेटियां ।
बाबुल के घर में महकती थी जो गुलाबों की तरह हर पल ,
ससुराल में हर दूसरे पल क्यों जलाई जाती हैं बेटियां ।
रखकर कलेजे पर अपने पत्थर ,बाबुल ने विदा कर दिया ,
न सोचा एक पल भी किसी ने माँ बाप के ह्रदय की विशालता ,
जख्मों को बनाकर एक नासूर ,क्यों हर पल रुलाई जाती हैं बेटियां ।

                                          १०७.My video




                                                             १०६ सम्मान समारोह 



जय श्री कृष्णा मित्रो शुभ संध्या ,अक्रूर धाम गोपीनाथ फाउंडेशन मथुरा वृंदावन के तत्वाधान में बहुप्रतिक्षित श्रीअक्रुरग्रन्थ का विमोचन १६ अक्टूबर को आगरा रोड स्थित कैलाश फार्म अलीगढ़ में आयोजित किया गया |ग्रन्थ का विमोचन अखिल भारतीय श्री वैश्य बारह्सैनी महासभा के संरक्षक श्यामाचरण वार्ष्णेय की पत्नी ,डीजीपी आसाम प्रदीप कुमार ,राष्ट्रीय अध्यक्ष इंद्रकुमार गुप्ता आदि सम्मानित सदस्यों द्वारा किया गया | इस अवसर पर पूर्व महापौरआशुतोष वार्ष्णेय ,पूर्व महापौर सावित्री वार्ष्णेय आदि समाज के काफी वरिष्ठ सम्मानित सदस्य भी उपस्थित थे | इस कार्यक्रम में मेरा भी काव्य पाठ, अक्रूर धाम फाउंडेशन और अखिल भारतीय श्री वैश्य बारह्सैनी महासभा की महामंत्री सुनीता वार्ष्णेय द्वारा सम्मान किया गया | ये मेरे लिए बहुत हीअद्भुत अनुभूति रही | अक्रूर धाम गोपीनाथ फाउंडेशन और सुनीता वार्ष्णेय दीदी का मैं तहेदिल से आभार व्यक्त करती हूँ | धन्यवाद ;
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

Saturday, 15 October 2016

                                     १०५.शायरी 

अधूरी कहानियां उम्र भर का दर्द,
 तोहफे में दे जाती हैं ,
कब सूखते है कुछ नासूर वर्षा ,
जिंदगी यूँ ही तमाम होती है ।।

                                    १०४.आरक्षण 

क्या जातिगत आरक्षण देश की उन्नति में सहायक है ?
मुद्दे बहुत हैं दुनिया में बहस के ,
भूलकर काम की बातें व्यर्थ की बातें होती हों ।
कैसे बढेगा वो देश उन्नति के पथ पर ,
जहाँ प्यार और अमन की नहीं ,
रात दिन सिर्फ और सिर्फ जंग की बातें होती हैं ।

Wednesday, 12 October 2016

Pls vote my dhevti

Gd evng jai shree krishna
Hi, Everyone Vote for "gungun varshney" as cutest baby - Just open below link and click like button to Vote http://www.parentingnation.in/baby-photo-contest-india/Babyname_gungun_varshney_293934

Friday, 7 October 2016

                               १०३.जय माता दी 

जय माता दी 
घंटियों की गूंजती आवाजें दिली सुकून देती हैं ,
दिल की नीरवता को जैसे साहिल कोई देती हैं ।
मुस्कराती हुई तेरी तस्वीर सारे कष्ट हर लेती है ,
माँ तू ही तो है जगतधात्री ,भक्तों को शक्ति देती है 

Thursday, 6 October 2016

                         १०२. मेरा देश महान 

राजस्थान भीलवाड़ा से प्रकाशित सौरभ दर्शन (पाक्षिक पत्र )में मेरी रचना 


Sunday, 2 October 2016

                                           १०१. यादें 

यादें

http://sahityapedia.com/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%82-3-8183/
जैसे कोई बुझता हुआ दीपक ,
तेज रोशनी से अँधेरे को रोशन कर जाए ।
यादों से आज भी कुछ गुलशन महके हुए लगते है ।
मस्ती कहाँ थी जाम को पीने की ,
वो तो मजबूरी थी यादों को भुलाने की
पीने दे ऐ साकी फिर से तेरी नजरों से
आज भी कशिश है बाकी उनकी यादों की ।।
कभी सोचा था वीराने भी किसी सजा से कम नहीं ,
आज जाने क्यों वो खंडहर भी अपने जैसे लगते हैं ।

                               १००,कवितायें 

लखनऊ, दिल्ली और नागपुर से प्रकाशित पत्र रीडर टाइम्स में अलीगढ़ की विदुषी कवित्री वर्षा वार्षणये की दो रचनाएं।                                      


।बहुत बहुत धन्यबाद रीडर टाइम्स और भाई जी (मेहंदी अब्बास रिजवी जी जो स्वयं एक बहुत प्रसिद्ध हस्ती हैं ),आपकी कलम ने जो इज्जत मुझे बख्शी है उसके लिए मैं आपकी तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ ।आपके शब्दों को मैं फिर से लिख रही हूँ :

"वर्षा वार्ष्णेय हिंदी साहित्य में पहचान को मुहताज नहीं |अंग्रेजी साहित्य मनोविज्ञान औरअर्थशास्त्र में स्नातक , शिक्षण कार्य से भी जुडी रहीं |लेखन एवं कविता लिखना एक लम्बे समय से दिनचर्या रही है |"यही है जिंदगी"_ कविता संग्रह जिसका प्रमाण है | "नारी गौरव" से सम्मानित वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़ में वास करती हैं |
"शुक्रिया भाई जी "

1.सागर मंथन से निकलता है जब अमृत ,
पीने को उतावले सब हो जाते हैं ।।

पर जहर का भरा हुआ कलश ,
त्याग कर भोग को उतावले हो जाते हैं ।।

जिंदगी का सुख अगर तुमने लिया ,
तो दुःख भी तुम्हारा है ।।

क्यों भूलकर इस सत्य को ,
कुछ इंसान सन्यासी बन जाते हैं ।।

2.सत्ता के गलियारे चौखट और चमकते नज़ारे ,
हर मानव मन की उत्कंठा के वो अजीब से नारे
धोखा ,नजाकत ,रणनीति से भरे कैसे ये अंधियारे,
चाहत और मद लोलुपता ने बंद कर दिए आँखों के तारे ।।
न दिखाई देते जब राजनीति के कटु पर सत्य नज़ारे ,
फिर कैसे दिखाई देंगे दीनदुखियों के तड़फते हुए दुःख सारे ।।
छलकर झूठ से जो दिखाते हम सब को अनगिनत नज़ारे ,
डूब जाते उसी राजनीती में वो लोलुपता के मारे ।।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
 — feeling blessed.

                                           ९९. माँ 

मुद्दे की बात .........

एक माँ की ममता और दर्द को समझने के लिए पुरुषों को महिलाओं के साथ लेबर रूम में जाने पर पाबंदी नहीं होनी चाहिए ।एक पुरुष एक स्त्री की मनोव्यथा को तभी ठीक से समझ पायेगा ।शायद मेरी बात आप सबको मजाक लगे ,लेकिन यही सत्य है ।जब किसी पुरुष ने उस पीड़ा और दर्द को महसूस ही नहीं किया तो फिर वो किसी स्त्री और माँ के साथ कैसे न्याय कर पायेगा । माँ हो या भारत माँ ,उसका दर्द जानने के लिए दिल से एहसास जरूरी है ।

                                 ९८.महक 

महक फूलों की हो या फिर इंसान की ,
खिलने तक ही सुहानी लगाती है ।

कौन पूछता है मुरझाये हुए चेहरों को ,
जिंदगी सबको हंसती हुई अच्छी लगती है ।।

                          ९७.प्यार  या  पैसा 

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प्यार या पैसा

गगन चुम्भी इमारतों के नीचे जो बने होते हैं छोटे छोटे आशियाने ,
एक पल में ढह जाते हैं बनकर रेत् की तरह |
दिलों में खिले हुए प्यार भी एक वक्त गुम हो जाते हैं ,
जब ईमान डगमगाने लगते है नाव की तरह ।
कश्तियों में सवार मुसाफिर कब जानते हैं एक दूसरे को ,
बन जाते हैं हसीं रिश्ते बुनियाद की तरह ।।
जरूरी तो नहीं हमसफ़र की सोच एक जैसी हो राहों में ,
ले जाते थे फिर भी पार नैया कुशल सवारों की तरह ।
क्यों टूट रहे हैं आज रिश्ते सिर्फ पैसों की वजह से ,
क्यों है ये सवाल खड़ा महंगाई की तरह ?