मेरी रचनाएँ सौरभ दर्शन में,
२१.पति और बेटा

भूल गया अस्तित्व अपना ,फर्ज के गहरे फेर में !
एक तरफ है धर्म का नाता ,दूसरी ओर जन्मों का मेल !!
गर सुनता माँ बाप की ,तो पत्नी देती आँख तरेर ,
गर याद करता अपने फर्ज को ,
आँखों से बहता आंसुओं का ढेर !
समझौता कराने की जुगाड़ में ,दिन रात चल रहा मतभेद !
\क्यूँ नहीं समझता कोई ,बेचारी चक्की का दुख् भेद !!
दो पीढ़ियों की सोच में पति बन गया मदारी ,
न समझते दुःख माँ बाप उसका ,न समझने को आतुर उसकी नारी !!
गर सुनता पत्नी की ,दुनिया कहती जोरू का गुलाम ,
गर निभाता जन्मदाता का फर्ज ,दुनिया कहती डूब जा निर्लज्ज !!
समझना जरूरी है आज इंसान को इंसान का ही दर्द ,
नजर आयेगा नहीं तो दुनिया में जल्द ही ज़िंदा लाशों का संघर्ष !!
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 02 जुलाई 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
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